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मन्दबुद्धि बालक वरदराज

 मन्दबुद्धि बालक वरदराज =================== विद्यालय में वह मंदबुद्धि कहलाता था। उसके अध्यापक उससे नाराज रहते थे। क्योंकि उसकी बुद्धि का स्तर औसत से भी कम था। कक्षा में उसका प्रदर्शन सदैव निराशाजनक ही रहता था। अपने सहपाठियों के मध्य वो उपहास का विषय था। विद्यालय में जैसे ही वह प्रवेश करता, चारों ओर से उस पर व्यंग बाणों की बौछार सी होने लगती। इन सब बातों से परेशान होकर उसने विद्यालय आना ही छोड़ दिया। एक दिन वह मार्ग में निरर्थक ही भ्रमण कर रहा था। धूमते हुए उसे जोरों की प्यास लगी। वह इधर उधर पानी खोजने लगा। अंत में उसे एक कुआं दिखाई दिया। वह वहां गया और प्यास बुझाई। वह काफी थक चुका था, इसलिए पानी पीने के बाद वहीं बैठ गया। उसकी दृष्टि पत्थर पर पड़े उस निशान पर गई जिस पर बार बार कुएं से पानी निकालने के कारण रस्सी के निशान पड़ गए थे। वह मन ही मन विचार करने लगा कि जब बार बार पानी खींचने से इतने कठोर पत्थर पर रस्सी के निशान पड़ सकते है तो निरंतर अभ्यास से मुझे भी विद्या आ सकती है। उसने यह विचार गांठ में बांध लिया और पुन: विद्यालय जाना आरंभ कर दिया। उसकी लगन देखकर अध्यापकों ने बी उ...

मङ्गलाचरणम् इति शब्दस्य अर्थः ।

                                               मङ्गलाचरणम् संस्कृतजगति विद्यमानानां शब्दानां निष्पत्तिः धातुभ्यः एव भवति इति शाकटायनमतम् । ‘ सर्वं नाम धातुजमाह ’ इति तस्य सिद्धान्तः । तेन मङ्गलशब्दः अपि धातोः निष्पन्नः इति ज्ञायते । पुण्यम्, पूतः, पवित्रम्, शिवम्, शुभम्, कल्याणम्, भद्रम्, सौख्यम् इत्यादयः मङ्गलस्य पर्यायवाचिनः शब्दाः  सन्ति । आङ्-पूर्वकात् ‘ चर ’ इति धा तोः ल्युट्प्रत्यये कृते सति आचरणम् इति शब्दः निष्पद्यते । मङ्गलस्य आचरणम् इति मङ्गलाचरणम् । मगि (मङ्ग) गत्यर्थे इत्यस्मात् धातोः ‘ अचल् ’ प्रत्यये कृते सति ‘ मङ्गल ’ इति शब्दः निष्पद्यते । ‘ मङ्गल ’ इति शब्दः कल्याणसूचक ः अस्ति । सुखं कल्याणं वा आनयति यः सः मङ्गलः इति । मङ्गलशब्दस्य अर्थः एवमपि उच्यते – मङ्गल इत्यत्र द्वौ शब्दौ वर्तेते । एकः मम्, अपरश्च गल इति, मम् इति शब्दस्य अर्थ...
(समाजे प्रसिद्धानां शब्दानां व्युत्पत्तिपुरस्सरं व्याकरणदिशा विश्लेषणम्) विष्णुः   -      विश्वं वेवेष्टि व्याप्नोति यः सः विष्णु, विश्वं वेषति, सिञ्चति आप्यायते वा, विष्णाति वियुनक्ति भक्तान् मायापसारेण संसारादिति, विशति सर्वभूतानि, विशन्ति, अत्रेति वा, यस्माद्विश्वमिदं सर्वं तस्य शक्त्या महात्मनः । तस्मादेवोच्यते विष्णुर्विशधातोः प्रवेशनात् ।। प्रसादः                 -       प्रसीदन्ति जनाः यत्र, प्र +   सद् + घञ् उपाध्यायः           -       उपेत्याधियतेऽस्मात् इति उप + अधि + इङ् + घञ् आचार्यः               -        आङ् +   चर्   +   ण्यत् माता                  -        मान्यते पूज...