• पवित्रता  (स्वच्छता) के विषय शास्त्रीय निर्वचन ।


१.    अद्भिर्गात्राणि शुद्ध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्ध्यति ॥ (मनु.,५/१०९)

शरीर की शुद्धि जल से होती है । मन की शुद्धि सत्य से होती है । जीवात्मा की शुद्धि विद्या और तप से होती है और बुद्धि की शुद्धि ज्ञान से होती है ।

२.    क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेनाऽकार्यकारिणः ।
प्रछन्नपापा जप्येन    तपसा वेदवित्तमाः ॥ (मनु.५/१०७)

विद्वान् क्षमा से शुद्ध होते हैं, पाप करने वाले दान से शुद्ध होते हैं, गुप्त रूप में किए गए पापों से युक्त लोग जाप से शुद्ध होते हैं  तथा वेद के गूढ़ अर्थ को जानने वाले तपस्या से शुद्ध होते हैं ।

.    वाचां शौचं च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
सर्वभूते दया शौचमेतच्छौचं परार्थिनाम् ।। (चा.नीतिः.०७/२०)

वाणी की पवित्रता, मन की निर्मलता, इन्द्रियों को वश में रखना तथा जीव मात्र पर दया करना ही परोपकार में रत मनुष्यों की पवित्रता मानी जाती है ।

४.   सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
  योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारि शुचिः शुचिः ।। (मनु. ५/१०६)

सभी प्रकार की पवित्रताओं में धन सम्बन्धि व्यवहार की पवित्रता ही श्रेष्ठ मानी गई है । अतः अन्याय पूर्वक एवं गलत साधनों के द्वारा धन का संग्रह नहीं करना चाहिए। जो धन के व्यवहार में शुद्ध है, वस्तुतः वही शुद्ध है, न कि केवल मिट्टी और जल से शरीर की शुद्धि करने वाला व्यक्ति अर्थात् धन सम्बन्धी व्यवहार की पवित्रता ही सर्वोपरि है ।

५.   सत्यं शौचं मनः शौचं शौचमिन्द्रियनिग्रहम् ।
सर्वभूते दया शौचं जलशौचन्तु पञ्चमम् ।। (चा.नीतिः)

(संसार में कायिक, वाचिक और मानसिक पवित्रता के बिना कोई भी लौकिक शुभ कर्म नहीं हो सकते । अतः पवित्रता का अत्यधिक महत्त्व है । इस श्लोक में पवित्रता के पांच रूप दर्शाए गए हैं ।) पहली - वाणी की पवित्रता । दूसरी - मन की पवित्रता । तीसरी - इन्द्रियों की पवित्रता । चतुर्थ - सभी प्राणियों पर दया रूपी पवित्रता । पाँचवी - जल की पवित्रता

६.   यस्य वाङ्मनसी शुद्धे सम्यक् गुप्ते च सर्वदा ।     

      स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ।। (मनु.२/१६०)


जिसकी वाणी और मन पवित्र हैं और सदा वासनाओं से सुरक्षित रहते हैं, वही व्यक्ति ब्रह्मविद्या के फल को प्राप्त कर सकता है । 

७.   गण्डूषमपि कुर्वीत शीतेन पयसा मृदु ।
      कफतृष्णामलहरं मुखान्तःशुद्धिकारकम् ।। (भा.प्र.दिनचर्या-४२)

खानपान के बाद शीतल जल से धीरे-धीरे कुल्ला कर लेना
चाहिए । कुल्ला करने से मुख के अन्दर का कफ़ प्यास तथा मलिनता दूर होकर मुख शुद्ध हो जाता है ।
  
८.  कदापि न जनैः सद्भिर्धार्यं मलिनमम्बरम् ।
       तत्तु कण्डुकृमिकरं ग्लान्यलक्ष्मीकरं परम् ।। (भा.प्र.दिनचर्या -९३)


श्रेष्ठ मनुष्यों को कभी भी मैले कपड़े नहीं पहनने चाहिएँ । मैले कपड़े पहनने से खुजली और जुएँ आदि पैदा हो जाते हैं और ऐसे कपड़े घृणा को पैदा करते तथा मनुष्य की शोभा को नष्ट कर देते हैं । 
                                               

                       वरिष्ठशोधाध्येता (संस्कृतसंवर्धनप्रतिष्ठानम् – दिल्ली)

Comments

Popular posts from this blog